घुल गई आग इस चाँदनी में कहीं
खो गया दर्द इस रागिनी में कहीं
रो रही थी मेरी आज शाम-ए-गजल
अश्क गिरता रहा इस मौशिकी में कहीं
दिल के टुकड़ों में हम, देखते हैं गम
आईना बुझ गया इस रोशनी में कहीं
तेरे जाने की अब किससे शिकवा करें
ये जुबाँ मर चुकी इस आशिकी में कहीं
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