26 August 2015

तेरे दोस्तो मे अंजान नज़र आते ह

तुझसे मिलने को बेताब हो जाते है
मिले तो कुछ कहने मे घबरा जाते है
हुई दोस्ती हमे पता है
पर आज भी तेरे दोस्तो मे अंजान नज़र आते है

कभी एक दूसरो की भावनाओ को बताते
कभी एक साथ हसते मुस्कुराते
मानते हो हमे अच्छे दोस्त हमे पता है
पर आज भी तेरे दोस्तो मे अंजान नज़र आते है




कभी किताबो का बहाना था
हमे तो बस दोस्ती बड़ाना था
क्या कहता तेरे दोस्तो के बीच
मैं खुद तेरे दोस्तो मे बेगाना था

सुना दिया आपको दोस्ती का जो फरमाना था
किया जो वाडा वो तो निभाना था
अच्छी है आपकी दोस्ती हमे पता है
कभी कहेंगे दोस्ती का एक जमाना  था

जलते थे सब दोस्ती हमारी
ये हमारा पैमाना था
और इसके आगे क्या लिखू
मैं तो खुद तेरे दोस्तो मे बेगाना था


 कवि रुपेन्द्र साहू


 अन्य रचनाए -




       

No comments: