27 June 2015

हमसे भी क्यूं रोज तुम आंखें चुराया करते हो

सारी दुनिया से तो तुम खुद को किनारा करते हो
हमसे भी क्यूं रोज तुम आंखें चुराया करते हो
धोखा है हर शाम को सूरज का डूब जाना भी
ये कहकर तुम चांद पे ऊंगली उठाया करते हो
जंगल को भी हिला गया आंधियों का काफिला
कैसे तुम अपनी आहें सीने में छुपाया करते हो
फिर तुम रात की साज पे गाने लगे अपनी गजल
जब शहर सोता है तो तुम दीप जलाया करते हो

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