19 May 2015

दिल आख़िर तू क्यूँ रोता है.

जब जब दर्द का बादल छाया
जब घाम का साया लहराया
जब आँसू पलकों तक आया
जब यह तन्हा दिल घबराया
हुँने दिल को यह समझाया
दिल आख़िर तू क्यूँ रोता है?
दुनिया में यूँ ही होता है
यह जो गहरे सन्नाटे हैं
वक़्त ने सबको ही बाँटे हैं
तोड़ा घाम है सबका किस्सा
थोड़ी धूप है सबका हिस्सा
आँख तेरी बेकार ही नम है
हर पल एक नया मौसम है
क्यूँ तू ऐसे पल खोता है
दिल आख़िर तू क्यूँ रोता है. 



No comments: