मोम की तरह पिघलती जा रही हे ज़िंदगी
मोम की तरह पिघलती जा रही हे ज़िंदगी,
क्यू इस तरह हाथ से फिसल रही हे ज़िंदगीहम तुम्हे पाना चाहते हैं
अपने दिल में छुपाना चाहते हैं,पर क्यू अनचाहे सदमो से गुजर रही ह ज़िंदगी,
हर पल देखना चाहती है ये निगाहे तुम्हे,
तरस रही ह उजलो मे मचलने को ज़िंदगी,
ना जाने क्यू बीत रही
हे अंधेरो मे ये ज़िंदगी..
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